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कावड़ यात्रा कैसे निकलती है और क्या होती है कावड़, जानिए 7 पौराणिक बातें


प्रतिवर्ष श्रावण माह में कावड़ यात्रा का आयोजन होता है। भगवान शिव को समर्पित यह यात्रा हर जगह से निकलती है और भारी संख्या में लोग एकत्रित होकर यह यात्रा निकालते हैं। परंतु कोरोनाकाल के चलते और वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए इस कांवड़ यात्रा को स्थगित किए जाने का समाचार है। आओ जानते हैं कि यह यात्रा कैसे निकालते हैं और क्या होती है कावड़।

कावड़ या कावर क्या होती है?

‍1. दो मटकियों में किसी नदी या सरोवर का जल भरा जाता है और फिर उसे आपस में बंधी हुई बांस की तीन स्टिक पर रखकर उसे बांस के एक लंबे डंडे पर बांधा जाता है। इस अवस्था में आकृति किसी तराजू की तरह हो जाती है।

2. आजकल तांबे के लोटे में जल भरकर इसे कंधे पर लटकाकर यात्रा की जाती है। यात्रा करने वालों को कावड़िया कहते हैं।

3.

कावड़िये यह जल ले जाकर पास या दूर के किसी शिव मंदिर में शिवलिंग का

उस जल से

जलाभिषेक करते हैं।

4. कांधे पर कावड़ उठाए, गेरुआ वस्त्र पहने, कमर में अंगोछा और सिर पर पटका बाँधे, नंगे पैर चलने वाले ये लोग देवाधिदेव शिव के समर्पित भक्त होते हैं। ‘हर-हर, बम-बम’, ‘बोल बम’ के साथ भोले बाबा की जय-जयकार करता यह जनसमूह स्वतः स्फूर्त होकर सावन का महीना प्रारंभ होते ही ठाठें मारता चल पड़ता है।

5. शिव पर जल चढ़ाने की हमारी परंपरा बहुत पुरानी है। कहते हैं कि यह कार्य सबसे पहले भगवान परशुरामजी ने किया था। सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’का कावड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था।

6. पुराणों के अनुसार कावड यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया। शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया।तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने ‘पुरा महादेव’ स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ।

7. कुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था। सभी देवता शिवजी पर गंगाजी से जल लाकर अर्पित करने लगे। सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से हुआ।



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